कबीरदास की कहानी
Kabir भारतीय संत, कवि और समाज सुधारक थे। वे अपनी सादगी, भक्ति और दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी वाणी आज भी लोगों को सत्य, प्रेम और मानवता का संदेश देती है।
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Kabir भारतीय संत, कवि और समाज सुधारक थे। वे अपनी सादगी, भक्ति और दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी वाणी आज भी लोगों को सत्य, प्रेम और मानवता का संदेश देती है।
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बहुत समय पहले Varanasi में एक गरीब जुलाहा दंपति रहता था — नीरू और नीमा। एक दिन उन्हें तालाब के किनारे एक छोटा बच्चा मिला। उन्होंने उस बच्चे को अपना लिया। वही बच्चा आगे चलकर संत कबीरदास कहलाया।
कबीरदास बचपन से ही भगवान की भक्ति में रुचि रखते थे। उस समय Ramananda नाम के एक प्रसिद्ध गुरु थे। कबीर उन्हें अपना गुरु बनाना चाहते थे, लेकिन वे जानते थे कि गुरु उन्हें आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे।
एक सुबह कबीरदास गंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए। जब गुरु रामानंद स्नान करने आए, तो उनका पैर कबीर पर पड़ गया और उनके मुख से निकला — “राम-राम कहो।” कबीर ने इन्हीं शब्दों को गुरु मंत्र मान लिया और भगवान राम की भक्ति में लग गए।
कबीरदास ने लोगों को सिखाया कि भगवान मंदिर या मस्जिद में ही नहीं, बल्कि हर इंसान के दिल में बसते हैं। वे जाति-पाति और ऊँच-नीच के खिलाफ थे। उन्होंने प्रेम, सत्य और ईमानदारी का संदेश दिया।
उनका एक प्रसिद्ध दोहा है:
“बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना,
मुझसे बुरा न कोय॥”
इस दोहे का अर्थ है कि जब हम दूसरों में बुराई खोजते हैं तो पहले अपने अंदर झाँकना चाहिए।
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कबीरदास की कहानी हमें सिखाती है:
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