bhagwan jagannath ki kahani
भगवान जगन्नाथ जी की कथा
बहुत समय पहले, पुरी नगरी में एक महान राजा, नंदन वर्मा राज्य करता था। राजा बहुत ही धर्मपरायण और भक्तिमान था। उनका एक बड़ा सपना था कि उनके राज्य में भगवान का भव्य मंदिर बने, जिसमें सभी लोग भगवान की आराधना कर सकें।
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इस दौरान, एक विद्वान शिल्पी, विद्या शंकर वहाँ आए। उन्होंने राजा से कहा कि वह लकड़ी से भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन इसे बनाना बहुत कठिन है, क्योंकि यह लकड़ी केवल विशेष पवित्र पेड़ से ही बनेगी।
राजा ने तुरंत आदेश दिया और पूरे राज्य में पवित्र लकड़ी की खोज शुरू की गई। अंततः उन्हें निर्वाण वृक्ष मिला। विद्वान शिल्पी ने उस लकड़ी से तीन मूर्तियाँ बनाईं:
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भगवान जगन्नाथ (मुख्य रूप)
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भगवान बलभद्र (जगन्नाथ जी के बड़े भाई)
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देवी सुभद्रा (भगवान की बहन)
जब मूर्तियाँ तैयार हो गईं, तो उन्होंने कहा कि मूर्तियाँ अपने आप जीवन पाकर चल सकती हैं। राजा और पूरी नगरी के लोग बहुत प्रसन्न हुए।
इसके बाद, पुरी का भव्य जगन्नाथ मंदिर बनवाया गया। मंदिर में हर साल रथ यात्रा मनाई जाती है। इस दिन भगवान जगन्नाथ जी, बलभद्र और सुभद्रा को बड़े सुंदर रथों में बैठाकर शहर के चारों ओर घुमाया जाता है। यही रथ यात्रा आज भी लाखों भक्तों के लिए आनंद और भक्ति का अवसर है।
कथा का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची भक्ति और सेवा से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
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