bhagwan jagannath ki kahani

 


भगवान जगन्नाथ की कथा

बहुत समय पहले, वर्तमान ओड़िशा के पुरी में एक भव्य मंदिर का निर्माण होना था। उस समय एक अत्यंत भाग्यशाली और भक्तिशील राजा ने सोचा कि वह भगवान विष्णु की विशेष मूर्ति बनवाएंगे।

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राजा ने कई मूर्तिकारों को बुलाया, लेकिन किसी को भी वह काम पूर्ण रूप से नहीं कर पाया। तभी विशेष मूर्तिकार विष्णुचर्मा आए। उन्हें भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि वे पुरी आएँ और वहाँ भगवान की मूर्ति बनाएं।

विशेष बात यह थी कि भगवान जगन्नाथ और उनके भाई बल्लभदेव की मूर्तियाँ लकड़ी से बनाई जानी थीं, और उनकी आंखें पूर्ण रूप से मूर्तिकार स्वयं नहीं बना सकते थे। मूर्तिकार ने बहुत ध्यान और भक्ति से लकड़ी की मूर्तियाँ बनाई, लेकिन आखिरी चरण में भगवान ने स्वयं अपनी आँखें डाल दीं। इस कारण जगन्नाथ जी की आंखें गोल और बड़ी दिखाई देती हैं।

भगवान जगन्नाथ की विशेषता यह है कि वे हर किसी को समान रूप से देखते हैं और उनकी भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। यही कारण है कि उनके मंदिर में हर रोज़ लाखों भक्त आते हैं।

जगन्नाथ जी की सबसे प्रसिद्ध उत्सव यात्रा रथ यात्रा है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को बड़े-बड़े रथों में बैठाकर भक्तों के बीच ले जाया जाता है। यह यात्रा भक्तों के लिए असीम आनंद और आशीर्वाद का अवसर होती है।

कहानी का शिक्षा संदेश यह है कि भगवान सच्चे मन से किए गए भक्ति और श्रद्धा को हमेशा स्वीकार करते हैं, और उनकी कृपा सभी पर समान होती है।

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