bhagwan jagannath ki kahani

 


भगवान जगन्नाथ की कहानी

बहुत समय पहले ओडिशा के पुरी नगर में इंद्रद्युम्न नामक एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन उन्हें स्वप्न में संकेत मिला कि नीलाचल पर्वत पर नीलमाधव नाम से भगवान प्रकट हैं। राजा उन्हें पाने के लिए व्याकुल हो उठे।

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राजा ने अपने दूत विद्यापति को नीलमाधव का पता लगाने भेजा। बहुत प्रयास के बाद विद्यापति को भगवान नीलमाधव के दर्शन हुए। जब राजा वहाँ पहुँचे, तब भगवान अंतर्धान हो चुके थे। राजा दुःखी होकर तप करने लगे।

तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने आदेश दिया कि समुद्र से निकली पवित्र लकड़ी से उनकी मूर्ति बनाई जाए। उसी समय एक दिव्य बढ़ई प्रकट हुआ। उसने शर्त रखी कि मूर्तियाँ बनाते समय कोई उसे देखे नहीं।

कुछ दिन बाद अधीर होकर राजा ने दरवाज़ा खोल दिया। बढ़ई अंतर्धान हो गया और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं
इसी रूप में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की स्थापना हुई।

भगवान ने कहा—

“मैं इसी रूप में अपने भक्तों के बीच सदा निवास करूँगा।”

तभी से पुरी में भगवान जगन्नाथ की भव्य पूजा और रथ यात्रा होती है, जहाँ बिना भेदभाव सभी भक्त भगवान के दर्शन करते हैं।


शिक्षा

भगवान रूप से नहीं, भक्ति से प्रसन्न होते हैं

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