jagannath ji ki katha
भगवान जगन्नाथ जी की कथा
बहुत समय पहले, पुरूषोत्तम नारायण यानी भगवान विष्णु ने रथ यात्रा का अद्भुत रूप धरकर धरती पर आने का निश्चय किया। वह भूमि का कल्याण करने के लिए भगवान जगन्नाथ के रूप में उपस्थित हुए।
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ओडिशा के पुरी नगर में एक बड़े राजा का नाम निदान था। राजा के पास एक सुंदर देवता की मूर्ति बनाने का विचार आया। तब एक कुशल लकड़हारा और मूर्तिकार ने मिलकर भगवान की मूर्ति बनाई। यह मूर्ति लकड़ी की थी, इसलिए इसे हमेशा सावधानी और प्रेम से पूजा जाता है।
भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ है। यह तीनों भाई-बहन एक-दूसरे के साथ सदा पूजा और भक्ति के प्रतीक हैं।
प्रत्येक वर्ष, भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा होती है। लाखों भक्त इस यात्रा को देखने आते हैं और रथ खींचकर भगवान का सम्मान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी श्रद्धा और भक्ति से इस यात्रा में भाग लेता है, उसके सारे दुख दूर हो जाते हैं और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
भगवान जगन्नाथ जी की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण बात है भक्ति, सच्चाई और प्रेम। भगवान हमें सिखाते हैं कि चाहे हम गरीब हों या अमीर, बड़ा हो या छोटा, सबके लिए उनका प्यार समान है।
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