jagannath ji ki katha
भगवान जगन्नाथ जी की कथा
बहुत समय पहले, वर्तमान ओड़िशा (पूर्व में उड़ीसा) में एक नगर था, जिसे पुरी कहा जाता था। वहाँ एक महान राजा और उनकी प्रजा रहती थी। उस समय भगवान विष्णु ने अपने अनंत रूप में प्रकट होकर पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करनी चाही।
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भगवान विष्णु ने पुरी में जगन्नाथ रूप धारण किया। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बल्लभाचार्य/बालभद्र और बहन सुभद्रा के साथ यहां प्रकट हुए।
एक कथा के अनुसार, एक भक्त विष्णु सेनानी ने भगवान जगन्नाथ को लकड़ी से बनवाया। जब यह लकड़ी का शिल्प तैयार हुआ, तब भगवान ने अपनी दिव्य शक्ति से इसे जीवित किया। इस प्रकार भगवान जगन्नाथ, अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ जगन्नाथ मंदिर में विराजमान हुए।
भगवान जगन्नाथ की विशेषता यह है कि वे लकड़ी के देवता हैं और उनका रूप पूर्ण नहीं है, यानी उनके हाथ-पैर का आकार साधारण नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक है। यह बताता है कि भगवान हर जीव के लिए समान रूप से उपस्थित हैं और सभी को देख सकते हैं।
रथ यात्रा की कथा:
भगवान जगन्नाथ की सबसे प्रसिद्ध परंपरा है रथ यात्रा। हर वर्ष भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र को विशाल रथों में बैठाकर पूरे नगर में ले जाया जाता है। यह यात्रा भक्तों के लिए बहुत मंगलकारी होती है। कहा जाता है कि इस दौरान जो भी भक्त भगवान के रथ को खींचता है, उसके जीवन की सभी समस्याएँ दूर हो जाती हैं और उसे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
भगवान जगन्नाथ जी की पूजा करने से भक्तों का मन शुद्ध होता है, उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। उनका संदेश है कि सच्ची भक्ति और प्रेम से भगवान अपने भक्तों के निकट होते हैं।
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