jagannath ji ki katha
- Get link
- X
- Other Apps
भगवान जगन्नाथ जी की कथा
बहुत प्राचीन समय की बात है। उड़ीसा (ओडिशा) के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्होंने भगवान के दिव्य रूप के दर्शन करने की इच्छा से एक भव्य मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। एक दिन उन्हें स्वप्न में भगवान विष्णु ने दर्शन दिए और बताया कि वे नीलाचल में नीलमाधव के रूप में प्रकट हैं।
To read more jagannath ji ki katha visit our channel
राजा ने अपने सेवक विद्यानिधि को नीलमाधव की खोज में भेजा। बहुत प्रयास के बाद विद्यानिधि को सबर जाति के प्रमुख विश्ववसु के पास नीलमाधव के दर्शन हुए। राजा इंद्रद्युम्न स्वयं वहाँ पहुँचे, लेकिन तब तक नीलमाधव अंतर्धान हो चुके थे। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान अब दारु (लकड़ी) के रूप में प्रकट होंगे।
कुछ समय बाद समुद्र तट पर एक दिव्य लकड़ी का लठ्ठा (दारु ब्रह्म) प्राप्त हुआ। उसी समय एक वृद्ध बढ़ई के वेश में भगवान विश्वकर्मा आए और शर्त रखी कि वे मूर्तियाँ बंद कक्ष में बनाएँगे और काम पूरा होने से पहले दरवाज़ा नहीं खोला जाएगा। राजा ने शर्त मान ली।
काफी दिन बीत गए, भीतर से कोई आवाज़ नहीं आई। रानी की चिंता के कारण दरवाज़ा खुलवा दिया गया। दरवाज़ा खुलते ही बढ़ई अंतर्धान हो गए और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं। तभी आकाशवाणी हुई कि यही स्वरूप भगवान को प्रिय है।
इस प्रकार भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दिव्य विग्रह स्थापित किए गए। भगवान जगन्नाथ का अधूरा लेकिन करुणामय स्वरूप यह संदेश देता है कि ईश्वर रूप से नहीं, भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होते हैं।
कथा का संदेश:
भगवान जगन्नाथ सबके नाथ हैं। सच्ची श्रद्धा, समर्पण और प्रेम से भगवान स्वयं भक्त के पास आते हैं।
Add jagannath ji ki kahani to your daily routine
- Get link
- X
- Other Apps
Comments
Post a Comment