garbh katha
गर्भ कथा – “गर्भ में शिक्षित शिशु”
एक समय की बात है, एक गर्भ में शिशु अपने माता-पिता से बातें कर रहा था। उसने माँ से पूछा,
“माँ, बाहर की दुनिया कैसी है?”
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माँ ने प्यार से कहा,
“बाहर की दुनिया बहुत सुंदर है, लेकिन वहां कुछ अच्छे और कुछ बुरे लोग भी हैं। तुम्हें वहां अच्छाई अपनानी होगी और बुराई से दूर रहना होगा।”
फिर शिशु ने पूछा,
“पापा, मुझे ज्ञान और साहस कैसे मिलेगा?”
पिता ने मुस्कुराकर कहा,
“तुम्हें हमेशा सच्चाई और धैर्य के मार्ग पर चलना होगा। अपने विचार अच्छे रखो, शब्द अच्छे बोलो और कर्म अच्छे करो। यही तुम्हें शक्ति और ज्ञान देगा।”
शिशु ने फिर पूछा,
“अगर मैं डर जाऊँ या परेशान हो जाऊँ तो?”
माँ ने कहा,
“डरने की जरूरत नहीं। जब भी कठिनाई आए, ईश्वर की शरण में जाओ और अपनी बुद्धि से सही मार्ग चुनो। याद रखो, जो अच्छाई करता है, उसका जीवन हमेशा सुखी होता है।”
गर्भ में रहते हुए शिशु ने अपने माता-पिता की बातों को ध्यान से सुना और उनसे सीख लिया। जब वह जन्मा, तो उसके भीतर अच्छाई, साहस और ज्ञान की बीज पहले से ही अंकुरित हो चुके थे।
कथा का संदेश:
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बच्चे माता के गर्भ में रहते हुए भी माता-पिता के विचार और भावनाओं से प्रभावित होते हैं।
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माता-पिता को गर्भावस्था में सकारात्मक सोच और अच्छे संस्कार अपनाने चाहिए।
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सच्चाई, धैर्य, और अच्छाई के बीज ही जीवन में सफलता और सुख की नींव रखते हैं।
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