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भक्त प्रह्लाद की कहानी
बहुत समय पहले हिरण्यकशिपु नाम का एक शक्तिशाली राजा था। उसे वरदान मिला था कि वह न दिन में मरेगा, न रात में, न घर के अंदर, न बाहर, न मनुष्य से, न पशु से। इस कारण वह स्वयं को भगवान मानने लगा।
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लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का सच्चा भक्त था। राजा ने उसे बहुत समझाया, डराया और दंड दिया, पर प्रह्लाद की भक्ति अडिग रही। हिरण्यकशिपु ने उसे आग में जलवाया, पहाड़ से गिरवाया, विष पिलाया—लेकिन हर बार भगवान ने उसकी रक्षा की।
अंत में भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए—न मनुष्य, न पशु—और संध्या के समय, दरवाजे की चौखट पर हिरण्यकशिपु का अंत किया। इस प्रकार अहंकार का नाश हुआ और भक्ति की विजय हुई।
संदेश:
सच्ची भक्ति और विश्वास के आगे कोई शक्ति टिक नहीं सकती। अहंकार का अंत निश्चित है।
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